Wednesday, March 21, 2007

एक विचित्र सा मुकदमा

दिन के 10 बजकर पन्द्रह मिनट होने वाला है. नंदनवन के उच्चन्यायालय मे जज (झबड़ा भालू) के आने का समय हो गया था. न्यायलय परिसर मे एक ईँच भी खाली जगह नही था. चारो तरफ सन्नाटा लेकिन नेप्थ्य से कानाफुसी की आवाज. फुल धुप मे भी अधखिले थे मानो इस मुकदमे की गँभीरता अन्हेँ हँसने से मना कर रहा हो. झबड़ा भालू आज एक ऐतिहासिक और विचित्र सा मुकदमा पर अपना फैसला सुनाने वाला था. मामला था पप्पी नामक कुतिया और शेरु नामक कुत्ते के तलाक का. चूकि शेरु ने तलाक दिया था... इसीलिए पप्पी ने मुकदमा दायर किया था कि उसे वकायदे पुरा गुजारा भत्ता दिया जाए. लेकिन शेरु का अपना तर्क था औरा और मामला दो कुत्ते से हँटकर अब दो वकीलों (जोजो और बोजो नामक दो सियार)पर आ टिका था.

हम अभीए लौटते हैँ. ज्यादा नरभसाईएगा नही.


क्रमशः ...

Saturday, February 24, 2007

कलम की बातें


लगभग डेढ़ साल हो गए अपने इस छोटे से चिट्ठा पर कुछ शोभनीय वा अशोभनीय डालने हेतु अपने लैप-टाप के की बोर्ड पर ऊँगलियाँ टपर टपर करते हुए. मैने अपने प्रोफाइल मे बता रखा हूँ .... कि जब से कलम ने साथ निभाना छोड़ा है की बोर्ड पर ऊँगलियाँ यूँ ही टपर टपर टपर करती हैँ. इसी प्रोफाईल से ध्यान आया आखिर कलम ने साथ निभाना क्योँ छोड़ दिया और छोड़ ही दिया तो मेरी दुनियाँ कितनी प्रभावित हुई है.
फिर मै सोचने लगा आखिरी बार मैने कब कलम प्रयोग किया था ?? हाँ डेढ़ साल पहले किसी को चिट्ठी लिखा था. अब मुआ... इस जमाने मे चिट्ठी आदमी कलम सe क्योँ कर लिखने लगा. अजी बात ही ऐसी थी. रहा नही गया सो चिट्ठी लिख दिया. सो चिट्ठी लिखे डेढ़ साल... इम्तहान दिए तीन साल... डायरी लिखे हुए 5 साल हो गए... तो आखिरी बार मैने कलम का प्रयोग किया कब था...?? दिमाग पर जोर डाला तो याद आया कि अभी तीन दिन पहले अपने मोबाईल को रीचार्ज करवाया था. पैसा अपने क्रेडिट कार्ड से चुकाया था और दुकानदार ने स्वीक्रीतिनामा पर मेरा हस्ताक्षर करवाया था. और उससे पहले ..... फिर याद आया कुछ एक सप्ताह पहले चेकबुक पर हस्ताक्षर किया था.समय बदला, दुनियाँ बदल गई और इसा दुनियाँ मे रहने वाले लोग. इस बदली हुई दुनियाँ मे कलम का क्या औकात ?? कलम की जगह की-बोर्ड ने ले लिया. कलम का प्रयोग केवल हस्ताक्षर करने तक मे सिमट कर रह गया है. कलम अपने सुन्दर सुन्दर लिखाबटोँ के द्वारा लोगों को एक अभिन्न पहचान देती थी... आज अपने पहचान बचाने के लिए लोगोँ से गुहार लगा रही है.

Saturday, February 04, 2006

अ डेट विद नोबेल लारेट (A date with nobel Laurete)


वैसे तो जिन्दगी मे बहुत ऐसे मौके आते हैं जब हम अपने आपको भाग्यशाली समझ सकते हैं लेकिन कल का नजारा ही कुछ और था. मौका था एक लेक्चर सुनने का और हम अपने को भाग्यशाली समझ बैठे थे. समझे भी क्यों नहीं. मेरे सामने खडे थे १९८५ के भौतिकी विषय का नोबेल पुरस्कार विजेता, प्रोफ़ेसर क्लौस वौन क्लिटज़िन्ग. Prof Klaus Von Klitzing आई०आई०टी० मे रहने का यही मतलब होता है. पहले सुना करता था, कल सब कुछ सामने था. कल का मौका सबके लिए एक महत्वपुर्ण था: हमलोगों के लिए क्योंकि हम एक नोबेल पुरस्कार विजेता का लेक्चर सुन रहे थे और यह महत्वपुर्ण था प्रोफ़ेसर क्लौस वौन क्लिटज़िन्ग के लिए क्योंकि कल के ही दिन उन्होने १९८० मे जर्मनी के मैक्स प्लैंक रीसर्च प्रयोगशाला मे रात के २:०५ मिनट पर भौतिकी के एक महत्वपुर्ण घटना का खोज किया था जिसका नाम है "क्वाण्टम हाल ईफ़ेक्ट". अतः कल वह अपने अविष्कार का २६वीं वर्षगांठ मना रहे थे.
उन्होने बताया कि कैसे जब उन्होने अपने इस खोज को प्रकाशित करने के लिए अमेरिका के "फीजिकल रीव्यु" जनरल मे भेजा तो प्रधान सम्पादक ने टिप्पणी भेजा: यह लेख इस महत्वपुर्ण जरनल मे प्रकाशित होने की काबीलियत नही रखता है इसीलिए यह प्रकाशित नही हो सकता. उन्होने हम सभी को कल वह चिट्ठी भी दिखाया जो उस प्रधान सम्पादक ने उनको लिखा था. उन्होने हम सभी को वह नोटबुक (कापी) का पन्ना दिखाया जिसपर उन्होने अपने अपने अनुसन्धान का मैनुस्क्रीप्ट तैयार किया था.
लेक्चर के बाद प्रश्नोत्तर कार्यक्रम था. मैने देखा की दुनिया मे यदि ह्युमर के लिए कोइ नोबेल पुरस्कार होता तो उनको यह पुरस्कार कब के मिल चुका होता. एक मजे हुए प्रोफ़ेसर की सारी खुबीयाँ मौजुद थी उनमे. बहुत सारे प्रश्न किए गए... लेकिन मुझे वह प्रश्न बहुत अच्छा लगा जिसको एक बी०टेक० का एक छात्र पुछा था, " आप जब हमारे उम्र के थे तो बाँकी लोगों से कैसे अलग थे ?" उन्होने बताय कि बचपन मे गणित की कक्षा मे वह पुस्तक का सवाल के बदले अपना सवाल बनाते रहते थे और फिर उसको हल करते थे. इससे उनके गुरुजी इस कदर नारज थे की आगे चल कर उनको गणित विषय ही छोडना पडा और उन्होने अपना ध्यान भौतिकि विषय मे लगाया क्योंकि इस विषय मे गणित के नित्य नए प्रयोग से उनको कोइ नही रोक सकता था और जिसका परिणाम नोबेल पुरस्कार से हुआ. उन्होने अपने अनुसंधान के बहुत सी बारीकियोन को बताया जिसको लिखना यहाँ बहुत कठिन होगा.
मैं भग्यशाली समझता हूँ अपने आपको इस जीवित अवतार से मिलकर.

Saturday, September 17, 2005

फिर क्या होगा उसके बाद

अपनी शादी के बाद अपने पीताजी को यह कविता पत्र मे लिख कर दिया था... माँ कहती है उनके आँख मे आंसू आ गया था.. वह क्या था, .... लीजिए चिट्ठाकारो के माहाजाल के विहंगम पटल पर एक कविता जो सातवीं कक्षा से मुझे जीवन का पाठ पढा रही है:
फिर क्या होगा उसके बाद
फिर क्या होगा उसके बाद,
उत्सुक होकर शिशु ने पुछा
माँ क्या होगा उसके बाद?

रवि से उज्ज्वल शशि मे सुन्दर,
नव किसलयदल से कोमलतर,
वधु तुम्हारी घर आएगी,
उस विवाह उत्सव के बाद

पल भर मुख स्मित की रेखा,
खेल गयी माँ फिर ने देखा,
कर गम्भीर मुखकृति शिशु ने,
पुछा माँ का क्या होगा उसके बाद ?

फिर नभ से नक्षत्र मनोहर,
स्वर्ग लोक से उतर उतर कर,
तेरे शिशु बनने को मेरे,
घर आयेंगे उसके बाद

मेरे नये खिलौने लेकर,
चले ना जाये वह अपने घर,
कर गम्भीर मुखाकृति शिशु ने,
पुछा माँ क्या होगा उसके बाद ?

अब माँ का जी उब चुका था,
हर्ष श्रान्ति मे डुब चुका था,
बोली फिर मैं बुढी होकर,
मर जाऊंगी उसके बाद

यह सुनकर भर आया लोचन,
किन्तु पोंछकर उसि क्षण,
उत्सुक हो शिशु ने पुछा,
माँ क्या होगा उसके बाद ?
कवि को बालक ने सिखलाया,
सुख-दू:ख है पल भर की यह माया,
है अनन्त का तत्व प्रश्न यह,
फिर क्या होगा उसके बाद
----पद्मनाभ मिश्र
आभार.... श्री बालकृष्ण राव

Friday, September 02, 2005

मेरा गाँव, गाँव का चौपाल और बिजली

मेरा गाँव, गाँव का चौपाल और बिजली

जब गोधूली का बेला आता था
जब निशा की आहट होती थी
जब गाँव मे चुल्हा जलता था
जब खग का कोलाहल होता था
तब मुरारी जाता था
सीढी से उपर चढता था
बाँस के लैम्प पोस्ट पर
लैम्प को वह जलाता था
फिर ऊजाला होता था
सरपंच वहाँ पर आता था
देश की बातें होती थी
विदेश की भी बातें होती थी
मेरी टोली भी जाता था
जुगनूँ के पीछे भागते थे
कका से डाँट खाते थे


खुब कहानी बनती थी
जब निशा का बेला आता था
जब घोर अन्धेरा छाता था
और मुरारी जा था
लैम्प पोस्ट का लैम्प जलाता था
और ऊजाला छाता था
हमारे गाँव के चौपाल की यही कहानी थी


हो गया सब उलट पलट
अब की सरकार चली गयी
एक नयी नवेली आ गयी
खूब सेखी बघारा था
जब सरकर मे वह आया था
खुब वादा करता गया
एक-आध को पुरा करता गया
मेरे गाँव को वह पलट दिया
बाँस के लैम्प पोस्ट को बदल दिया
अब बिजली का लैम्प लगा दिया
शुरुआत मे खुब बिजली रहती थी
लेकिन अब बिजली नही रहती है
अब अन्धेरा रहता है

अब जब गोधूली का बेला आता है
अब जब निशा की आहट होती है
अब जब गाँव मे चुल्हा जलता है
जब खग का कोलाहल होता है
मेरे गाँव के चौपाल पर घोर अन्धेरा रहता है
झिन्गुर की झन-झन होती है
मेढक का टाँव-टाँव होता है
मुझे खुब डरावना लगता है
बिजली ने सब कुछ बदल दिया
चौपाल को उसने पलट दिया

जब नही थी बिजली
खुब ऊजाला रहता था
जब आ गयी बिजली
घन्घोर अन्धेरा रहता है