Friday, April 08, 2005

Dear ECERS;

प्रिय अनुसन्धान अध्येता ;
बहुत दिनो से मेरी परम इच्छा था की मै हिन्दी मे कुछ ब्लोग लिखूँ. सो लीजिए तैयार है ब्लोग.
परिसर नेटवर्क पर तरह तरह के आरोप प्रत्यारोप लगने के बाद अपने कुछ बन्धूओं द्वारा प्राचीन भारत का विश्व विख्यात विश्वबिद्यालय तक्षशीला पर आधारित "चाणक्य" सीरियल को परिसर नेटवर्क पर देने से एक बार सबके लिए मौका मिला कि उस सीरियल से आनन्द उठावें. हम लोग काफी हद तक सफ़ल रहे आनन्द उठाने मे.
आखिर एक दिन हममे से सबको अध्यन अध्यापन और अनुसन्धान क्षेत्र मे ही रहना है. चाणक्य का अद्भूत व्यक्तित्व हम सबको प्रेरित करता है न केवल इस क्षेत्र मे आगे बढने के लिए बल्कि एक जिम्मेदार नगरिक भी बनने के लिए. जब भी मैन चाणक्य सीरियल देखा मै रोमान्चित हो उठा. उसका एक एक सँवाद दिल को झकझोर देता है.

मेरी दिल की इच्छा है कि आप भी उन सँवादो को पढें और अपने अनुसंधान मे उत्साहित होकर काम करें. नीचे कुछ सँवाद लिख रहा हूँ

१. (चाणक्य घनान्द से): शिक्षक कभी साधारण नहीं होता घनानन्द!!! निर्माण और प्रलय उसके गोद मे खेलते हैं.

२. (चाणक्य अपनी माँ से):- जो मर गया वह तुम्हारा पति था! मेरे पिता तो मेरे धमनीयों मे बह रहे रक्त के कण-कण मे मौजूद है. चणक अब अपने पुत्र के रक्त के कण-कण मे चाणक्य बनके दौडेगा.

३. (सिकन्दर अपने सैनिक से):- मै भारत के एक-एक राजा पर विजय पा लिया. सब लोग मेरे आगे नतमस्तक हैं. लेकिन मै जीत नहीं सका तो भारत के एक शिक्षक वर्ग को. समझ मे नहीं आता है वे कैसे लोग हैं जिनको ना तो धन क लोभ है, ना राज्य का. मांग कर खाते हैं. उच्च विचार वाले इन लोगों को मौत का भी भय नहीं हैं. कास ऐसे लोग हमारे यूनान मे भी होते.

४. (चाणक्य अपने शिष्य से): उत्तिष्ठ भारत:!!!

2 comments:

Naren said...

Good job Padmanabh :-) Keep posting similar thought provoking blogs.

Rajeev Ranjan Lall said...

पद्मनाभ जी,
आपके "मास्साब...पाँच मिनट" संस्मरण ने काफी सारी स्कूली यादें ताजा कर दीं । धन्यवाद ।
इसके साथ मैं भी एक संस्मरण को यहाँ स्थान दे रहा हूँ, जिसने मेरे मस्तिस्क में शिक्षक की छवि को आदर्श रूप प्रदान किया था ।
http://rajeevranjanlall.blogspot.com/