Friday, May 13, 2005

मा...स्सा...ब पाँच मिनट..

रात के साढे दस बजे इंस्टीट्यूट के मुख्य परिसर के सामने घास के मैदान मे बैठा कुछ सोच रहा था, बल्कि प्राक्रितिक हवा का आनन्द ले रहा था. सामने लिखा लम्बे बोर्ड पर लिखा था "इन्डियन इंस्टीट्यूट आफ़ टेक्नोलोजी, डेडिकेटेड टू द सर्विस आफ़ नेशन" लगा कितना प्रासंगिक एवम सत्य है ये वाक्य???.खास तौर पर "डेडिकेटेड" शब्द तो ४५ डीग्री उल्टा लटका था जो मेरे मन के शंकाओं को और ज्यादा बलवान कर रहा था. इतना ही नहीं उसमे से भुगभुगाती रौशनी मेरे ध्यान को केन्द्रित ही नही होने दे रही थी. "डेडिकेटेड" सब्द के भुगभुगाती रौशनी से मेरा ध्यान यादों के गलियारों से निकलता हुआ पहले खडगपूर से शुरु होकर "इलाहाबाद" फिर गोरख्पुर से होता हुआ बनैनियाँ तक जा पहुँचा. " बनैनियाँ " मेरा गाँव जहां मैं जिन्दगी के शुरुआती १४ साल गुजारा था. ललित कोसी पीडीत उच्च विद्यालय बनैनिञा. हाँ उससे भी पहले राज्यकीय मध्य विद्यालय बनैनिञा मेरा वास्तविक कर्म भूमि. इस स्कूल की याद आते ही कान मे जोर से सुनाइ दिया "मा...स्सा...ब पाँच मिनट...!!! सोचा क्यों ना ब्लोग लिखूं.........

पाँच मिनट बोले तो बिहार के मिथिला रीजन मे बाथरूम, टोइलेट, १ नम्बर, पकिस्तान के बदले स्कूल मे बोला जाने वाला वाक्य. देश के दुसरे हिस्से मे जितना अच्छा परिवेश उतना अच्छा तरीका.पाँच मिनट को अलग अलग अलग ढंग से बोला जाता है. जितना सभ्य समाज उतना ही सभ्य तरीका. पाँच मिनट के बोलने के तरीके से किसी का संस्क्रिति और सभ्यता उजागर होता है. यही नही लोग यहाँ तक बोलते हैं कि इससे कोइ अपने पारिवारिक वातावरण का संक्षेप मे परिचय दे देता है. बात परिवारीक हो तो कोइ बात नही यहां तो पाँच मिनट से राष्ट्रीयता और राष्ट्रप्रेम की भी भावना जुडता है. दस लोगों के बीच मे बैठे हों और अपना राष्ट्रप्रेम दिखाना हो तो पाकिस्तान को गाली देने से अच्छा और क्या हो सकता है, सो बोल दो पाकिस्तान जाना है. कितना सभ्य तरीका और कितना सारा राष्ट्रप्रेम. लेकिन हम तो राष्ट्रीयता से ऊँचा उठ कर वसुधैव कुटुम्ब्कम मे विश्वाश करते हैं इसीलिए पाकिस्तान को गाली देने के बजाए ... पाँच मिनट.

पाँच मिनट का नाम लेते ही याद आता है राज्यकीय मध्य विद्यालय बनैनिञा के एक टीचर श्री उपेन्द्र नारायण झा गाँव वालों के लिये यही नाम बांकी टीचर के लिए उपेन्द्र बाबू और हम लोगों के लिए उपेन्दर मास्स...साब. विशेषता ये को वो हम लोगो के एक पीढी उपर का भी गुरुजी रह चुके थे. किसी विद्यार्थी को धमकाना हो तो वह बोलते थे तुम्हारे पीताजी को इसी क्लास मे पीटाइ किया था तो तुम क्या चीज हो. लेकिन कालन्तर मे एक विशेष बीमारी बुढापा ने आंखो से लाचार कर दिया था.

हमारे उपेन्दर मास्सा..ब की आंख की रौशनी कमजोर पर गयी थी. हमारे पीताजी के अपेक्षा हम लोगों के उपर उनकी उतनी निगरानी नही रह पाती थी. और उपर से ५-मिनट और १०-मिनट का चक्कर ने तो उन्हें और ज्यादा लाचार बना दिया. वह करते भी तो क्या करते विद्यार्थी आते होठों को भींच कर सामने हथेली दिखाते हुए बोलते... "मा...स्सा...ब पाँच मिनट... इससे पहले की मास्सा...ब कुछ सोच पाते वह भाग चुका होता.

इस बार उपेन्दर मास्सा..ब टाइट हो गये बोले एक बार मे केवल २-३ विद्यार्थी ही पाँच मिनट जाएगा. फिर बांकी का क्या होगा. समय बीतता गया और उपेन्दर मास्सा...ब टाइट होते गए. और फिर आ गया मई का महीना. कच्चे सडक के किनारे जंगली जिलेबी का पेड और उस पर लटका हुआ लाल-लाल रंग का जलेबी. मास्सा..ब इतना टाइट और बीतता समय. स्कूल से ५-१० मिनट मिलता नही. लगा इस साल बिना जलेबी का निकल जाएगा. शाम को हमारे मित्र मन्डली ने निर्णय लिया चाहे जो कुछ भी हो मास्साब से ५-१० मिनट लेकर हम लोग जिलेबी तोडने जायेंगे. दल तैयार तो हो गया वकायदे कुटनीती के साथ की कल क्या करना है.

लो कल भी आ गया.. चाणक्य की तरह कुटनीति तो तैयार हो गयी, लेकिन कूटनीति को लागू करने का साहस किसी मे नहीं था. आखिर सिकन्दर का साहस होगा किसके अन्दर. लोगों ने आखिर सिकन्दर चुन ही लिया 'मैं, और 'अमोल'. समय आया मैं और अमोल सिकन्दर का साहस लिए उपेन्दर मास्साब के पास .... बहुत ही नजदीक एक साथ गया. हम दोनो ने अपना अपना हथेली अचानक उपेन्दर मास्साब के आंखों के सामने करता हुआ जोर से चिल्लाया मास्स..स्स..साब..... पाँच मिनट..... इससे पहले की मास्साब अपनी कमजोर नजरों से कुछ देख पाते और अनुमान लगाते की आखिर हुआ क्य....?? योजना के अनुसार बिरोज, विपिन, कैलाश, ब्रजेश और सम्बोध फ़रार. मुझको और अमोल को तो परमिशन मिल ही गया था. बांस के पेर पर चढ कर जिलेबियां टुटने लगी. ५ से १० मिनट हुआ. १० मिनट से आधा घन्टा और फिर एक घन्टा मे कुछ ही समय रहा होगा कि उपेन्दर मास्साब को ६-७ विलुप्त विद्यार्थी के तरफ़ ध्यान गया. इधर उधर खोजा कहीं नही. हमारे दल मे चाणक्य की कुटनीति थी... समय रहते सिकन्दर का साहस भी आ गया था लेकिन हम चन्द्रगुप्त की तरह दूरदर्शी नही थे. सोच ही नही की मास्साब यदि पैदल चलकर यहां तक आ जए तो क्या होगा. और उपेन्दर मास्सब सामने खडे थे. काटो तो खून नहीं. अपने दल मे एक दुसरे की कमीयां नजर आने लगी. मास्साब गरज कर बोले.... अच्छा ये है पाँच मिनट. विरोज के बुशर्ट मे रखे लाल लाल जलेबी अपने आप जमीन पर आ गया. विपिन तो बांस पर जो चढा लगा मास्साब कुछ देखे ही नही.

अन्त मे हम लोगों को स्कूल लया गया. सजा मिलि १० छडी... एक सप्ताह तक रोज खांत पढाने की जिम्मेदारी....

अभी भी कुछ प्रश्न हमेशा मुझे झकझोरता है. क्या मास्साब पाँच मिनट के बदले इतन ही रोचक कोइ सब्द कोन्वेन्ट स्कूल मे भी बोला जाता होगा या ये कोन्वेन्ट वाले "लौर्ड मैकाले" को अपना सर्वश्व लुटाने के बाद हम गाँव को असभ्य समझते रहेंगे. उत्तर चाहे कुछ भी हो.... हमारे लिए तो "मा...स्सा...ब पाँच मिनट... एक सभ्य संस्क्रिति का नाम है.... जो दुनियाँ मे 'झा' , 'मखान' , 'पाग' , बगिया, सामा-चकेबा सा और इस तरह के बहुत सारी चीजों की तरह पवित्र है.

.................पद्मनाभ मिश्र

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11 comments:

आलोक said...

जनाब, लिखना छोड़ दिया क्या?
बढ़िया लिखते हैं, और प्रतीक्षा है।

kevinprehiem47647955 said...
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rosemary42kelby said...
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Laxmi N. Gupta said...

मिश्रा जी,

मेरा ब्लाग विज़िट करने के लिये धन्यवाद। ए भी लिख देते कि कविता कैसी लगी तो और उत्तम होता। आपके ब्लाग को देखा। अच्छा लिखते हैं लेकिन ज़रा वर्तनी (spelling) की गलतियों का धयान रखें तो और अच्छा होगा जैसे "प्राक्रतिक" नहीं "प्राकृतिक"। वैसे भाषा भी व्याकरण के हिसाब से सही हो तो सभी क्षेत्रों के लोगों को समझने में आसानी होती है।

लक्ष्मीनारायण गुप्त

अनुनाद सिंह said...

स्वागतम् , पद्मनाभ जी !

हिन्दी चिट्ठाजगत में आपका हार्दिक स्वागत है ।

हिन्दी अन्तर्जाल का एक विहंगम दृष्य देखने के लिये एक बार यहाँ पधारें :

http://pratibhaas.blogspot.com/2005/07/links-to-hindi-resources-on-web.html

Laxmi N. Gupta said...

कुमार जी,

अगर हिन्दी से आपका मतलब खड़ी बोली हिन्दी है तो बहुत ही कम लोग हैं जिनकी मातृ भाषा हिन्दी है। मेरी मातृभाषा अवधी है जिसमें रामचरितमानस लिखी गयी है, औरों की ब्रज है या बुन्देललखंडी है या भोजपुरी आदि आदि। मेरे विचार में ये सभी हिन्दी की बोलियाँ हैं और हम सभी हिन्दीभाषी हैं।

सस्नेह,

लक्ष्मीनारायण

Debashish said...
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Debashish said...

Please also see here.

ansh said...

This is really gr8 that people from KGP are involved in Hindi literature.Why don't you write for our gymkhana magazine Alankar.I am a dual degree final yr and will be leaving campus in a few days but would like to meet you .my email ID anshul2001anshul@yahoo.co.in
no. 9932375945

पद्मनाभ मिश्र said...
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पद्मनाभ मिश्र said...

यह संस्मरण हिन्दी पत्रिका रचनाकार मे भी प्रकाशित हो चुकी है. इसको देखने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें यहाँ क्लिक करें