Friday, September 02, 2005

मेरा गाँव, गाँव का चौपाल और बिजली

मेरा गाँव, गाँव का चौपाल और बिजली

जब गोधूली का बेला आता था
जब निशा की आहट होती थी
जब गाँव मे चुल्हा जलता था
जब खग का कोलाहल होता था
तब मुरारी जाता था
सीढी से उपर चढता था
बाँस के लैम्प पोस्ट पर
लैम्प को वह जलाता था
फिर ऊजाला होता था
सरपंच वहाँ पर आता था
देश की बातें होती थी
विदेश की भी बातें होती थी
मेरी टोली भी जाता था
जुगनूँ के पीछे भागते थे
कका से डाँट खाते थे


खुब कहानी बनती थी
जब निशा का बेला आता था
जब घोर अन्धेरा छाता था
और मुरारी जा था
लैम्प पोस्ट का लैम्प जलाता था
और ऊजाला छाता था
हमारे गाँव के चौपाल की यही कहानी थी


हो गया सब उलट पलट
अब की सरकार चली गयी
एक नयी नवेली आ गयी
खूब सेखी बघारा था
जब सरकर मे वह आया था
खुब वादा करता गया
एक-आध को पुरा करता गया
मेरे गाँव को वह पलट दिया
बाँस के लैम्प पोस्ट को बदल दिया
अब बिजली का लैम्प लगा दिया
शुरुआत मे खुब बिजली रहती थी
लेकिन अब बिजली नही रहती है
अब अन्धेरा रहता है

अब जब गोधूली का बेला आता है
अब जब निशा की आहट होती है
अब जब गाँव मे चुल्हा जलता है
जब खग का कोलाहल होता है
मेरे गाँव के चौपाल पर घोर अन्धेरा रहता है
झिन्गुर की झन-झन होती है
मेढक का टाँव-टाँव होता है
मुझे खुब डरावना लगता है
बिजली ने सब कुछ बदल दिया
चौपाल को उसने पलट दिया

जब नही थी बिजली
खुब ऊजाला रहता था
जब आ गयी बिजली
घन्घोर अन्धेरा रहता है